Kundalini dhyan aur bramhacharya-2

कुंडलिनी ध्यान और ब्रम्हचर्य भाग २

कुंडलिनी ध्यान और ब्रम्हचर्य भाग २ मे….. ब्रह्मचर्य मे आने वाली अडचने और उसका समाधान.

इस विषय को समझने के लिये शरीर की कुछ क्रिया को समझना होगा. जैसे कि हम जब भोजन करते है तब उसका रस, रक्त, मांस, मेद यानी चर्बी, अस्थि यानी हड्डी, मजा यानी हड्डी के बीच का मांस और बाद मे शुक्र वीर्य तैयार होता है. भोजन करने से लेकर सप्तधातु तैयार होने तक २८ दिन का समय लगता है.

खाना हम रोज खाते है इससे बच्चे के पैदा होने से लेकर १३-१४ वर्ष तक की उम्र तक बच्चो मे हर्मोंस बनते रहते है. १३-१४ वर्ष के बाद स्त्री-पुरुष मे सप्तधातु बनने शुरु हो जाते है. यानी स्त्रियो मे २८ दिन मे मासिक चक्र की शुरुवात हो जाती है तथा पुरुषो मे २८वे दिन वीर्य बनना शुरु हो जाता है. इसी के साथ स्त्री – पुरुष मे अपोजिट सेक्स के प्रति आकर्षण निर्माण होना शुरु हो जाता है. खाना चूकि रोज खाते है इसलिये मूलाधर पर सप्तधातु का दबाव बढना शुरु हो जाता है. अत्यधकि दबाव पर मन चंचल हो जाता है, कामुक विचार आने शुरु हो जाते है. और अधोमुखी स्वभाव की वजह से ये सप्तधातु नीचे की तरफ बहना शुरु हो जाता है. इससे कुछ समय के लिये मन को आराम आ जाता है फिर कुछ समय बाद मन फिर से चंचल हो जाता है. खैर ये तो शरीर की नैसर्गिक क्रिया है. लेकिन इसकी वजह से पूजा, ध्यान, धारणा या किसी भी किस्म अध्यात्मिक कर रहे हो तो इसी सप्तधातु की वजह से समस्या आनी शुरु हो जाती है या सफलता मिलनी बंद हो जाती है.

इस समस्या से जितना भी बचने की कोशिश करेंगे उतनी ही समस्या बढती जायेगी. यानी किभी हालत मे इन कामुक विचारो को रोका नही जा सकता.  क्योकि सप्तधातु की प्रवत्ति नीचे की तरफ बहना ही है. अब मै आपको बहुत ही प्रभावशाली उपाय बता रहा हु.

समस्या तभी बढती है जब सप्तधातु का दबाव मूलाधार पर बढ जाता है. इसलिये कभी भी आप योग- ध्यान-धारणा- प्राणायाम या किसी भी प्रकार का अध्यात्मिक अभ्यास कर रहे है तब अभ्यास समाप्त होने के बाद वज्रोली मुद्रा या अश्विनी मुद्रा अपनाये यानी अभ्यास समाप्त होने के बाद कोई भी आसन लगाकर बैठ जाये और अपने गुदा को ३० से ३५ बार संकुचित करे और छोडे. यानी उस भाग को दबाये और छोडे…. बस इतना ही करना है. जब आप गुदा को संकुचित करते है और छोडते है तब आपका सप्तधातु उर्ध्वगामी हो जाता है यानी ऊपर की तरफ खिचता है. और यह औरा मे यानी तेज मे बदल जाता है. इससे मूलाधार मे दबाव कम हो जाता है या मूलाधार मे दबाव समाप्त हो जाता है. और जब दबाव समाप्त हो जाता है तब मन का विचलित होना या कामुक विचार अपने आप समाप्त होने लगते है. और न्रम्हचर्य का पालन करने मे मदत होने लगती है. जब इस अभ्यास को स्त्री करती है तब इसे अश्विनी मुद्रा कहा गया है, जब पुरुष करता है तब इसे वज्रोली मुद्रा कहा गया है. कुंडलिनी के अभ्यास मे ये मुद्राये बहुत ही जरूरी मानी जाती है क्योकि यही शक्ती मूलाधार से सहस्त्रार चक्र तक यात्रा करती है.

अब जाने इससे लाभ

  • सप्तधातु ऊपर की तरफ जाने से कुंडलिनी अभ्यास मे सफलता मिलती है.
  • मन शांत रहता है
  • योग ध्यान, प्राणायाम मे सफलता मिलती है
  • चेहरे पर तेज बढने लगता है
  • आत्मविश्वास बढ जाता है
  • शरीर मे आकर्षण शक्ति बढने लगती है.
  • विवाहित जीवन मे कोई समस्या नही आती.

आशा है कि यह जानकारी आपके लिये उपयोगी सिद्ध होगी.

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