Jal Tatva Dhyan

जल तत्व ध्यान

मनुष्य का शरीर ५ तत्वो से मिलकर बना है इन्ही ५ तत्व का ध्यान मनुष्य को सफलता ऊचाइयो तक पहुचा देता है.  लेकिन आज हम इन ५ तत्व मे से जल तत्व ध्यान की बात करेंगे.

पृथ्वी तत्व  ध्यान के बाद जल तत्व ध्यान करना चाहिये. या फिर सीधे जल तत्व ध्यान कर सकते है.  जल तत्व का स्थान स्वाधिष्ठना चक्र मे माना जाता है.  हमारी जीभ को स्वाद इसी तत्व की वजह से आता है.

बिमारी मे जल तत्व का संतुलन बिगड जाता है जिससे मुह का स्वाद बिगड जाता और भोजन अच्छा नही लगता या भोजन तथा पानी का स्वाद अच्छा नही लगता. यह तत्व बिपरीत लिंग के प्रति आकर्षण को बढाता है. लडके- लडकिया कम उम्र मे भटक जाते है उसका कारण ही जल तत्व का संतुलन बिगड जाना होता है.

जल तत्व ध्यान के बहुत से लाभ मिलते है जैसे…

  • आकर्षण शक्ति बढती है
  • भूख-प्यास पर नियंत्रण आता है उपवास करने की क्षमता बढती है
  • सहन शक्ति बढती है
  • स्वभाव पर नियत्रण होना शुरु हो जाता है.
  • हर तरह का ब्यसन तथा बुरी आदतो पर नियंत्रण आना शुरु हो जाता है.
  • शरीर मे जल तत्व संतुलित है तो भौतिक सुख की कमी नही रहती.

इसके अलावा आप कुछ समस्या का सामना कर रहे है तो पृथ्वी तत्व ध्यान अवश्य करना चाहिये. जैसे कि

  • बुरी संगत, बुरे लोगो की संगत
  • नशीले पदार्थो का सेवन
  • व्यसन करना
  • बुरी आदते
  • सीखने की क्षमता कमजोर होना
  • स्मरण समस्या
  • गर्भधारण मे समस्या
  • मासिकधर्म की समस्या
  • भोजन का शरीर मे न लगना
  • ठंडी चीज खाने से बिमार हो जाना
  • सर्दी-जुखाम तथा छीक से हमेशा परेशान रहना
  • नाभी का खिसक जाना
  • किसी को सताने पर आनंद आना
  • किसी की तकलीफ देखकर आनंद आना
  • पाचन क्रिया कमजोर हो जाना
  • पेट से संबंधित सभी बिमारियां

इनमे से आप किसी भी समस्या का सामना कर रहे है तो जल तत्व ध्यान अवश्य करना चाहिये.

अब जानते है कि जल तत्व ध्यान कैसे करे…

किसी भी शांत कमरे मे ढीले-ढाले वस्त्र पहनकर किसी भी आसन मे बैठ जाये. १० बार सामान्य प्राणायाम करे. यानी गहरी सांस ले और छोडे. इस तरह से दस बार करे. फिर २० बार अश्विनी या वज्रोली मुदा करे यानी २० बार गुदा को यानी मल विसर्जन स्थान को संकुचित करे व छोडे. इस तरह से २० बार करने के बाद ्नाभी स्थान पर ध्यान केन्द्रित करे….  ध्यान भटक जाये तो तुरंत १० बार अश्विनी या वज्रोली मुदा करे व फिर से ्नाभी पर ध्यान केन्द्रित करे. यह अभ्यास २-३ दिन तक करने से नाभी पर ध्यान लगना शुरु हो जाता है.  इस तरह से ध्यान  यह अभ्यास १० मिनट रोज करे. और कम से कम एक महीने तक रोज अभ्यास करे.   इस तरह से आप देखेंगे कि आपको आश्चर्यजनक परिणाम मिल रहे है.

जल तत्व ध्यान के नियम..

  • अभ्यास मे पूरी श्रद्धा रखे
  • इस अभ्यास को स्त्री-पुरुष जो १६ वर्ष के ऊपर हो कर सकते है
  • इस अभ्यास को सुबह करना अच्छा माना जाता है लेकिन शाम को भी कर सकते है
  • मांसाहार-शराब या किसी भी प्रकार का ब्यसन नही करना चाहिये
  • तेन-्मिर्च-्मसालो का अपने भोजन प्रयोग कम करे
  • इस अभ्यास मे कभी कभी बहुत पसीना आता है या बार बार बाथरूम जाना पड सकता है या कभी कभी सर्दी-जुखाम होना शुरु हो जाता है अगर ऐसा होता है तो घबराये नही आपका शरीर आपके अंदर की खराबी को निकाल रहा है. अगर ऐसा नही हो रहा है तो कोई बात नही.
  • महिलाये मासिक धर्म मे ३-४ दिन का गैप करने के बाद फिर कंटीन्यू कर सकती है.

  • अभ्यास की अवधि मे ब्रम्हचर्य रहना अनिवार्य है

  • अभ्यास समाप्त होने के बाद अश्विनी या वज्रोली मुद्रा अवश्य अपनाये. यह मुद्रा आपको ब्रह्मचर्य का पालन करने मे मदत करती है.  अश्विनी या वज्रोली मुद्रा क्या है व इसका अभ्यास कैसे करे, यह जानने के लिये नीचे डिस्क्रिप्शन मे लिंक दिया गया है, आप देख सकते है.

  • पति-पत्नि हफ्ते मे एक बार संबंध रख सकते है.

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