Prathvi Tatva Dhyan

पृथ्वी तत्व ध्यान

आज हम पृथ्वी तत्व ध्यान के बारे मे जानेंगे. तथा यह जानने की कोशिश करेगे कि ज्यादा से ज्यादा पृथ्वी तत्व का लाभ कैसे उठाये.

मनुष्य का शरीर ५ तत्वो से मिलकर बना है इन्ही ५ तत्व का ध्यान मनुष्य को सफलता ऊचाइयो तक पहुचा देता है.  लेकिन आज हम इन ५ तत्व मे से पृथ्वी तत्व ध्यान की बात करेंगे.

पृथ्वी तत्व की वजह से ही चुंबकीय शक्ति का विकास होता है. क्योकि पूरी सृष्टी आकर्षण से प्रभावित होती रहती है। पृथ्वी के उत्तर-दक्षिण दिशा में चुंबकीय ध्रुव विद्यमान रहते हैं। इसकी वजह से मनुष्य को गुरुत्वाकर्षण की शक्ति मिलती है। और इस ऊर्जा शक्ति का प्रभाव सभी जड़-चेतन  वस्तु पर समान रूप से पड़ता रहता है। इसलिये पृथ्वी तत्व का ध्यान हमारे अंदर की क्षमताओ को कई गुना बढा देता है.

पृथ्वी तत्व का स्थान मूलाधार यानी गुदा से लेकर पैर तक स्थित होता है मूलाधार चक्र पर शुषुम्ना नाडी भी स्थित होती है जिसके बिना कुंडलिनी जागरण मे सफलता नही मिल पाती. क्योकि यही नाडी सभी चक्रो को खोलने का कार्य भी करती है. इसलिये पृथ्वी तत्व ध्यान की अहमियत और भी बढ जाती है.

पृथ्वी तत्व ध्यान के बहुत से लाभ मिलते है जैसे…

  • आकर्षण शक्ति कई गुना बढ जाती है
  • कुंडलिनी जागरण मे मदत मिलती है
  • पीलिया की समस्या से आराम मिलता है
  • प्राणशक्ति की कमी यानी बहुत कमजोर होना
  • यौन क्षमता मे कमी दूर होने लगती है

इसके अलावा आप कुछ समस्या का सामना कर रहे है तो पृथ्वी तत्व ध्यान अवश्य करना चाहिये. जैसे कि

  • सेक्स मे मन न लगना
  • पेट के बल अत्यधिक सोना
  • अत्यधिक स्वप्न दोष होना
  • शरीर बहुत ही नाजुक होने की वजह से बार-बार बिमार पडना
  • पैरो का दर्द
  • जल्दी थक जाना
  • हमेशा गंदे सपने आना
  • अच्छे काम करने का मन न होना
  • २४ घंटे सपनो की दुनिया मे रहना
  • सूघने की शक्ति कमजोर होना
  • स्वभाव मे अहंकार आ जाना
  • पैर या जांघो मे खिचाव आना
  • शरीर मे भारीपन महसूस होना
  • एलर्जी की समस्या
  • रक्त की बिमारिया
  • हड्डी का कैंसर
  • जोडो का दर्द
  • हड्डी की बिमारिया
  • शरीर विकास की समस्या या शरीर का सही ढंग से विकास न हो पाना.
  • किसी भी प्रकार का भय या मानसिक समस्य

इनमे से आप किसी भी समस्या का सामना कर रहे है तो पृथ्वी तत्व ध्यान अवश्य करना चाहिये.

अब जानते है कि पृथ्वी तत्व ध्यान कैसे करे…

किसी भी शांत कमरे मे ढीले-ढाले वस्त्र पहनकर किसी भी आसन मे बैठ जाये. १० बार सामान्य प्राणायाम करे. यानी गहरी सांस ले और छोडे. इस तरह से दस बार करे. फिर २० बार अश्विनी या वज्रोली मुदा करे यानी २० बार गुदा को यानी मल विसर्जन स्थान को संकुचित करे व छोडे. इस तरह से २० बार करने के बाद गुदा स्थान पर ध्यान केन्द्रित करे….  ध्यान भटक जाये तो तुरंत १० बार अश्विनी या वज्रोली मुदा करे व फिर से गुदा पर ध्यान केन्द्रित करे. यह अभ्यास २-३ दिन तक करने से मूलाधार पर ध्यान लगना शुरु हो जाता है.  इस तरह से ध्यान  यह अभ्यास १० मिनट रोज करे. और अकम से कम एक महीने तक रोज अभ्यास करे.   इस तरह से आप देखेंगे कि आपके अंदर अनोखा बदलाव हो रहा है.

पृथ्वी तत्व ध्यान के नियम..

  • अभ्यास मे पूरी श्रद्धा रखे
  • इस अभ्यास को स्त्री-पुरुष जो १८ वर्ष के ऊपर हो कर सकते है
  • इस अभ्यास को सुबह करना अच्छा माना जाता है लेकिन शाम को भी कर सकते है
  • मांसाहार-शराब या किसी भी प्रकार का ब्यसन नही करना चाहिये
  • तेन-्मिर्च-्मसालो का अपने भोजन प्रयोग कम करे
  • यह अभ्यास आपकी कामशक्ति को बढाने का भी कार्य करता है, इसलिये मन पर नियंत्रण रखे व अभ्यास मे रुकावट न आने दे.
  • उत्तर दिशा की ओर मुह करके अभ्यास करे

  • महिलाये मासिक धर्म मे ३-४ दिन का गैप करने के बाद फिर कंटीन्यू कर सकती है.

  • अभ्यास की अवधि मे ब्रम्हचर्य रहना अनिवार्य है

  • अभ्यास समाप्त होने के बाद अश्विनी या वज्रोली मुद्रा अवश्य अपनाये. 

  • पति-पत्नि हफ्ते मे एक बार संबंध रख सकते है.

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